उत्तराखंड और हिमालयी राज्यों में भूकंप के झटके आने से पहले मिलेगा अलर्ट

दुनिया के अन्य देशों की तरह भारत के पास भी भूकंप की पहले से सटीक भविष्यवाणी करने वाली कोई वैज्ञानिक तकनीक नहीं है। हालांकि, भारत ने हिमालयी क्षेत्र में ऐसे भूकंपीय निगरानी नेटवर्क और क्षेत्रीय भूकंप पूर्व चेतावनी प्रणालियां विकसित की हैं, जो भूकंप शुरू होने के तुरंत बाद और खतरनाक झटके पहुंचने से कुछ सेकंड पहले लोगों को अलर्ट कर सकती हैं।

अर्ली वार्निंग सिस्टम को और बेहतर बनाने की दिशा में सबसे सफल प्रयास आईआईटी रुड़की ने उत्तराखंड सरकार के साथ मिलकर किया है। दोनों ने मिलकर भूदेव नाम का एक अत्याधुनिक भूकंप पूर्व चेतावनी ऐप विकसित किया है। यह ऐप भूकंप के खतरों से निपटने और स्थानीय लोगों की सुरक्षा व लचीलापन सुनिश्चित करने के लिए आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करता है।

हिमालयी क्षेत्रों में रियल-टाइम मॉनिटरिंग

सरकार ने बीते दिसंबर में संसद को बताया था कि पूरे हिमालयी क्षेत्र में अर्ली वार्निंग सिस्टम को समर्पित रियल-टाइम भूकंपीय नेटवर्क शुरू किया गया है। इसके साथ ही, नेशनल सेंटर फॉर सीस्मोलॉजी क्षेत्रीय डेटा का उपयोग करके प्रोटोटाइप ईईडब्ल्यू एल्गोरिदम विकसित और टेस्ट कर रहा है।

इसके जरिए पी-वेव की सटीक पहचान, भूकंप की तीव्रता का तेजी से अनुमान और झटके आने से पहले की सटीक भविष्यवाणी की जा सकेगी।

कैसे काम करता है अर्ली वार्निंग सिस्टम?

जब भी कोई भूकंप आता है, तो उसमें से पी-वेव्स निकलती हैं। ये तरंगें सबसे तेजी से यात्रा करती हैं और आमतौर पर कम नुकसान पहुंचाती हैं। ईईडब्ल्यू सिस्टम भूकंप के एपिसेंटर के पास इन्हीं शुरुआती पी-वेव्स को पकड़ लेता है।

इसके बाद, विनाशकारी तरंगों के पहुंचने से पहले ही दूर स्थित इलाकों में अलर्ट भेज दिया जाता है। इस तकनीक से प्रशासन और आम लोगों को सायरन बजाने या सुरक्षित स्थानों पर पहुंचने के लिए कुछ बेहद कीमती सेकंड मिल जाते हैं।

इस सिस्टम से मिलने वाला चेतावनी का समय इस बात पर पूरी तरह निर्भर करता है कि कोई शहर या इलाका भूकंप के केंद्र से कितनी दूर है।

इसका सीधा मतलब यह है कि अगर आप भूकंप के केंद्र के बिल्कुल करीब हैं, तो आपको चेतावनी का समय नहीं के बराबर मिलेगा। वहीं, अगर भूकंप का केंद्र सैकड़ों या हजारों किलोमीटर दूर है, तो बचाव के लिए कुछ अतिरिक्त और बेहद अहम सेकंड मिल सकते हैं।

भारत में कहां लगे हैं सेंसर?

भारत में यह सेंसर नेटवर्क मुख्य रूप से उत्तराखंड के गढ़वाल और कुमाऊं क्षेत्रों में स्थापित किया गया है। इन सेंसरों को जानबूझकर सक्रिय फॉल्ट जोन के बहुत करीब रखा गया है।

जब ये सेंसर पी-वेव्स को डिटेक्ट करते हैं, तो तेज झटके आने से पहले आसपास के शहरों में अलर्ट भेज देता  है। दुनिया के अन्य देशों की बात करें तो फिलहाल जापान, ताइवान और अमेरिका के पास सबसे उन्नत भूकंप पूर्व चेतावनी प्रणालियां मौजूद हैं।

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