महान कर्मयोगी, अद्भुत वीर गुरु गोविंद सिंह को नमन

उनके महान कर्मयोगी होने का प्रमाण है

महान कर्मयोगी, अद्भुत वीर गुरु गोविंद सिंह को नमन

By - नागेन्द्र बहादुर सिंह चौहान

गुरु गोबिंद सिंह ने अपनी जिंदगी में वह सब देखा था जिसे देखने के बाद शायद एक आम मनुष्य अपने मार्ग से भटक या डगमगा जाए लेकिन उनके साथ ऐसा नहीं हुआ. परदादा गुरु अर्जुनदेव की शहादत, दादा गुरु हरगोविंद द्वारा किए गए युद्ध, पिता गुरु तेगबहादुर की शहीदी, चार में से बड़े दो पुत्रों (साहिबजादा आजीत सिंह एवं साहिबजादा जुझार सिंह) का चमकौर के युद्ध में शहीद होना और छोटे दो पुत्रों (साहिबजादा जोरावर सिंह और साहिबजादा फतेह सिंह) को जिंदा दीवार में चुनवा दिया जाना, वीरता व बलिदान की विलक्षण मिसालें हैं. इस सारे घटनाक्रम में भी अड़िग रहकर गुरु गोबिंद सिंह संघर्षरत रहे, यह कोई सामान्य बात नहीं है. यह उनके महान कर्मयोगी होने का प्रमाण है।
ज़फरनामा में स्वयं गुरु गोविन्द सिंह जी ने लिखा है कि जब सारे साधन निष्फल हो जायें, तब तलवार ग्रहण करना न्यायोचित है। सन 1699 में बैसाखी वाले दिन केशगढ़ साहब में श्री गुरु गोविन्द सिंह ने एक विचित्र नाटक किया। खुले मैदान में खडे ह़ोकर उन्होंने एक सिर माँगा, लोग हैरान थे कि हाथ में तलवार लेकर वह एक व्यक्ति का सिर माँग रहे हैं। यह कैसी अनोखी माँग है। एक- एक करके पाँच जांबाज़ अपना शीश देने के लिए आगे आए और गुरु गोविन्द सिंह के उस आह्वान को चरितार्थ किया। वो पाँच प्यारे जो देश के विभिन्न भागों से आए थे और समाज के अलग- अलग जाति और सम्प्रदाय के लोग थे, उन्हें एक ही कटोरे में अमृत पिला कर गुरु गोविन्द सिंह ने एक बना दिया। गुरु गोविन्द सिंह का एक और उदाहरण उनके व्यक्तित्व को अनूठा साबित करता है- पंच पियारा बनाकर उन्हें गुरु का दर्जा देकर स्वयं उनके शिष्य बन जाते हैं और कहते हैं- ख़ालसा मेरो रूप है ख़ास, ख़ालसा में हो करो निवास । गुरु गोविंद सिंह ने धर्म एवं समाज की रक्षा हेतु ही ख़ालसा पंथ की स्थापना की ।
ख़ालसा यानि ख़ालिस (शुद्ध) जो मन, वचन एवं कर्म से शुद्ध हो और समाज के प्रति समर्पण का भाव रखता हो। सभी जातियों के वर्ग-विभेद को समाप्त करके उन्होंने न सिर्फ समानता स्थापित की बल्कि उनमें आत्म-सम्मान और प्रतिष्ठा की भावना भी पैदा की। उन्होंने ख़ालसा के सृजन का मार्ग देश की अस्मिता, भारतीय विरासत और जीवन मूल्यों की रक्षा के लिए, समाज को नए सिरे से तैयार करने के लिए अपनाया था। गोविन्द सिंह जी ने एक नया नारा दिया था - वाहे गुरु जी का ख़ालसा, वाहे गुरु जी की फतेह।
गुरु गोविन्द सिंह ने अपना अंतिम समय निकट जानकर अपने सभी सिखों को एकत्रित किया और उन्हें मर्यादित तथा शुभ आचरण करने, देश से प्रेम करने और सदा दीन-दुखियों की सहायता करने की सीख दी. इसके बाद यह भी कहा कि अब उनके बाद कोई देहधारी गुरु नहीं होगा और ‘गुरुग्रन्थ साहिब‘ ही आगे गुरु के रूप में उनका मार्ग दर्शन करेंगे। गुरु गोबिंद सिंह की मृत्यु 7 अक्टूबर 1708 में नांदेड़, महाराष्ट्र में हुई थी।
एक आध्यात्मिक गुरु के अतिरिक्त गुरु गोविंद सिंह एक महान विद्वान भी थे। उन्होंने 52 कवियों को अपने दरबार में नियुक्त किया था। गुरु गोविन्द सिंह की महत्वपूर्ण कृतियाँ हैं- ज़फरनामा एवं विचित्र नाटक। वह स्वयं सैनिक एवं संत थे। उन्होंने अपने सिखों में भी इसी भावनाओं का पोषण किया था। गुरु गद्दी को लेकर सिखों के बीच कोई विवाद न हो इसके लिए उन्होंने "गुरुग्रन्थ साहिब" को गुरु का दर्जा दिया।
पांच ककार : युद्ध की प्रत्येक स्थिति में सदा तैयार रहने के लिए उन्होंने सिखों के लिए पाँच ककार अनिवार्य घोषित किए, जिन्हें आज भी प्रत्येक सिख धारण करना अपना गौरव समझता है।
केश : जिसे सभी गुरु और ऋषि-मुनि धारण करते आए थे। 
कंघा : केशों को साफ करने के लिए। 
कच्छा : स्फूर्ति के लिए। 
कड़ा : नियम और संयम में रहने की चेतावनी देने के लिए और
कृपाण : आत्मरक्षा के लिए।


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