MADHYA PRADESH FLOOR TEST : सुप्रीम कोर्ट ने कहा, यह किसी राज्य की नहीं बल्कि देश की समस्या है

स्पीकर के फैसले में कोई दखल नहीं दे सकता है।

MADHYA PRADESH FLOOR TEST : सुप्रीम कोर्ट ने कहा, यह किसी राज्य की नहीं बल्कि देश की समस्या है

मध्यप्रदेश में गहराता राजनीतिक संकट के बीच बहुमत परीक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट में आज फिर से सुनवाई शुरू हो गई है। स्पीकर की ओर से पेश हो रहे वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि यह स्पीकर का अधिकार है कि वह चुने कि किसे इस्तीफा स्वीकार किया जाना है और किसका नहीं। स्पीकर के फैसले में कोई दखल नहीं दे सकता है। सुप्रीम कोर्ट में है जहां देश की शीर्ष अदालत ने कहा कि हम नहीं चाहते कि हॉर्स ट्रेडिंग हो इसलिए जल्द से जल्द फ्लोर टेस्ट कराया जाना चाहिए। फ्लोर टेस्ट कराए जाने के मामले पर सुनवाई के दौरान एक समय वह भी आया जब कोर्ट ने कहा कि यह किसी राज्य की नहीं बल्कि देश की समस्या है।

-सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संवैधानिक सिद्धांत जो उभरता है, उसमें अविश्वास मत पर कोई प्रतिबंध नहीं है, क्योंकि स्पीकर के समक्ष इस्तीफे या अयोग्यता का मुद्दा लंबित है। इसलिए हमें यह देखना होगा कि क्या राज्यपाल उसके साथ निहित शक्तियों से परे काम करें या नहीं। एक अन्य सवाल है कि अगर स्पीकर राज्यपाल की सलाह को स्वीकार नहीं करता है तो राज्यपाल को क्या करना चाहिए, एक विकल्प है कि राज्यपाल अपनी रिपोर्ट केंद्र को भेजे।

 सुनवाई के दौरान जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि एक बात बहुत स्पष्ट है कि विधायक सभी एक साथ काम कर रहे हैं, यह एक राजनीतिक ब्लॉक हो सकता है। हम कोई भी अर्थ नहीं निकाल सकते। वहीं जस्टिस हेमंत गुप्ता ने कहा कि संसद या विधानसभा के सदस्यों को विचार की कोई स्वतंत्रता नहीं है, वे व्हिप से संचालित होते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नियम के मुताबिक इस्तीफा एक लाइन का होना चाहिए।

सुनवाई के दौरान जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि अगर सदन सत्र में नहीं है और यदि सरकार बहुमत खो देती है तो राज्यपाल को विश्वास मत रखने के लिए स्पीकर को निर्देश देने की शक्ति है, क्या होगा जब विधानसभा को पूर्व निर्धारित किया जाता है और सरकार अपना बहुमत खो देती है? राज्यपाल फिर विधानसभा नहीं बुला सकते? चूंकि इसे अनुमति नहीं देना का मतलब अल्पमत में सरकार जारी रखना होगा।

अभिषेक मनु सिंघवी ने 14 मार्च की राज्यपाल की चिट्ठी की भाषा पर सवाल उठाते हुए कहा कि राज्यपाल ने लिखा है कि 22 विधायकों ने इस्तीफा भेजा है, मैंने भी मीडिया में देखा, मुझे भी चिट्ठी मिली, सरकार बहुमत खो चुकी है। राज्यपाल ने खुद ही तय कर लिया? इस पर जस्टिस हेमंत गुप्ता ने कहा कि अगर सरकार अल्पमत में है तो क्या राज्यपाल के पास फ्लोर टेस्ट कराने की शक्ति है। इस पर सिंघवी ने कहा कि नहीं, वह नहीं करा सकते, उनकी शक्ति सदन बुलाने के बारे में ही है।

कमलनाथ सरकार की ओर से वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि दलबदल कानून के तहत 2/3 का पार्टी से अलग होना आवश्यक है। अब इससे बचने के लिए नया खोज निकाला जा रहा है, 15 लोगों के बाहर रहने से हाउस का दायरा सीमित हो जाता है। यह संवैधानिक पाप के आसपास होने का तीसरा तरीका है। यह मेरे नहीं अदालत के शब्द हैं। सिंघवी ने कहा कि बागी विधायकों के इस्तीफे पर विचार के लिए दो हफ्ते का वक्त देना चाहिए।

जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने बताया कि हम कोई रास्ता निकालना चाहते हैं, ये केवल एक राज्य की समस्या नहीं है, बल्कि ये राष्ट्रीय समस्या है। आप यह नहीं कह सकते कि मैं अपना कर्तव्य तय करूंगा और दोष भई लगाऊंगा। हम उनकी स्थिति को सुनिश्चित करने के लिए परिस्थितियों बना सकते हैं कि इस्तीफे वास्तव स्वैच्छिक है और हम एक पर्यवेक्षक को बेंगलुरु या किसी अन्य स्थान पर नियुक्त कर सकते हैं। वे आपके साथ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग पर जुड़ सकते हैं और फिर आप निर्णय ले सकते हैं।

अदालत से लेकर बेंगलुरु तक राजनीतिक दांव पेंच जारी हैं। इससे पहले शीर्ष अदालत में मामले पर बुधवार को दिनभर सुनवाई हुई। सुप्रीम कोर्ट ने पहले दिन की सुनवाई के दौरान मप्र विधानसभा अध्यक्ष पर कड़ा रुख अख्तियार किया और 16 विधायकों के इस्तीफे नहीं स्वीकारने का कारण पूछा। अदालत में कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पक्ष के वकीलों में कई बार गरमागरम बहस भी हुई। भाजपा के वकीलों ने सभी 16 बागी विधायकों को पेश करने की इच्छा जाहिर की थी, जिसे अदालत ने ठुकरा दिया था।
अदालत में कानूनी पहलुओं पर इस मसले को मापा जा रहा है, वहीं भोपाल और बेंगलुरु में भी सियासी खेल जारी है। भोपाल में भाजपा ने दिग्विजय सिंह की शिकायत चुनाव आयोग से की है। भाजपा ने आरोप लगाया कि राज्यसभा चुनाव से पहले कांग्रेस नेता विधायकों को डराने की कोशिश कर रहे हैं।

वहीं दूसरी ओर बुधवार को बेंगलुरु में सियासी ड्रामा चरम पर रहा। कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह सुबह-सुबह बागी विधायकों से मिलने रिजॉर्ट पहुंचे, लेकिन राज्य पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया। शाम तक वो बाहर आए तो कर्नाटक हाईकोर्ट में विधायकों से मिलने की इजाजत मांगी लेकिन याचिका ही खारिज हो गई।
 


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